
क्रांतिकारी संकेत न्यूज़
वाम गठबंधन के लिए यह चुनाव राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है, तो एक दशक से सत्ता से दूर रहने वाले कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को इस बार बदलाव का इंतजार है।
पिछले एक दशक से सत्ता में बने रहने वाले वाम गठबंधन के लिए भी केरल विधानसभा चुनाव में मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। सत्ता विरोधी लहर के बाद अल्पसंख्यकों (ईसाई और मुसलिम) के बदलते रुख से सभी दलों की चिंताएं बढ़ी हुई हैं। केरल में करीब 45 फीसदी ईसाई और मुसलिम मतदाताओं की संख्या है, जबकि दलित वर्ग की आबादी करीब 9 फीसदी है। वाम गठबंधन के लिए यह चुनाव राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है, तो एक दशक से सत्ता से दूर रहने वाले कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को इस बार बदलाव का इंतजार है। पिछले स्थानीय निकाय चुनावों में एनडीए के प्रदर्शन को देखते हुए मतदाताओं में उसकी पैठ और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।
गठबंधन में वोट बंटवारे का डर
स्थानीय निकाय चुनावों में वाम दलों के कमजोर प्रदर्शन को छोड़ पिछले चुनावों में एनडीए को मतदाताओं से मिली बेरुखी का अगर कुछ फायदा मिलने की संभावना भी है तो दोनों प्रमुख गठबंधन के बीच मतों के बंटवारे से दोनों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। हालांकि जानकारों का कहना है कि विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 ( FCRA) का असर केरल चुनाव पर पड़ सकता है, खास तौर पर यूडीएफ इसे भुनाने की पुरजोर कोशिश में है। हालांकि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के मुताबिक कांग्रेस और वामपंथी दल, केरल के लोगों को गुमराह कर रहे हैं। पिछले चुनाव में भाजपा की वोट प्रतिशत में इजाफा के बाद जनाधार बढ़ता दिख रहा है।
FCRA भी है चुनाव में मुद्दा
राजनीतिक विश्लेषक एमएन कर्रासेरी ने कहा केरल में सत्ता-विरोधी लहर है, लेकिन सवाल अभी मुश्किल है कि इसका अधिक फायदा किस गठबंधन को मिलेगा। उन्होंने कहा, “अल्पसंख्यकों की भूमिका अहम है और वे विधेयक से डरे हुए हैं। केरल में ईसाई एफसीआरए बिल से डरे हुए हैं जबकि मुसलिमों को नागरिकता से जुड़े मुद्दों को लेकर चिंतित हैं। प्रदेश में 27 फीसदी मुसलिम जबकि 18 फीसदी ईसाई हैं। ऐसे में केरल में अल्पसंख्यकों और दलितों का समर्थन हासिल किए बगैर किसी भी दल के लिए सत्ता में पहुंचने की राह आसान नहीं है। पिछले दस वर्षों में मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन (एलडीएफ) के शासन में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को लेकर जनता के बीच बदलाव की भी चिंगारी बनी हुई है।”
कालीकट विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो जेएल प्रभाष के मुताबिक केरल विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर के अलावा अल्पसंख्यकों की भूमिका अहम है। कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन (यूडीएफ) और वाममोर्चा (एलडीएफ) के बीच कांटे की टक्कर है, क्योंकि वाम गठबंधन के तीसरी बार सत्ता में बने रहने की लड़ाई इसलिए ज्यादा अहम हो गई है क्योंकि देश भर में एकमात्र राज्य में वामदलों की सरकार है। प्रो प्रभाष के मुताबिक एलडीएफ अपनी कल्याणकारी योजनाओं के प्रदर्शन सहित तमाम वर्गों के समर्थन से सत्ता में बने रहने की कोशिश में जुटा हुआ है। केंद्र के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर ज्यादा प्रभावी है, इसलिए दोनों गठबंधन की निगाहें अल्पसंख्यक मतदाताओं पर टिकी हुई हैं।





