
क्रन्तिकारी संकेत न्यूज़
छतीसगढ़ के सक्ती जिले में पर्यावरण संरक्षण के दावे की पोल खोलने वाला मामला सामने आया है, जहां डभरा तहसील के ग्राम सकराली में बोरई नदी से लगे शासकीय जमीन पर बड़े पैमाने पर पावर प्लांट की राखड़ डंप की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है, मगर जिम्मेदार विभागों की ओर से अब तक कोई ठोस कारवाई नहीं की गई है।
मौजूदा जानकारी के मुताबिक ग्राम सकराली में नदी और नालों के किनारे भारी मात्रा में पावर प्लांट की राखड़ डंप की जा रही है। यह राखड़ हवा के साथ उड़कर आसपास के खेतों और आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच रही है, जिससे ग्रामीणों की सेहत पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि राखड़ की वजह से खेतों की उपजाऊ मिट्टी खराब हो रही है और आने वाले समय में खेती पर भी इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना
बता दें, इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है की पर्यावरण सुरक्षा को लेकर नियम स्पष्ट हैं। साथ ही, न्यायालय के आदेश भी मौजूद होने के बावजूद इतनी बड़ी लापरवाही आखिर कैसे हो रही है।
दरअसल हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी नदी, नाले या तालाब जैसे जल स्रोतों से 500 मीटर के भीतर राखड़ या औद्योगिक अपशिष्ट का निपटान नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद सकराली में बोरई नदी और नाले के बेहद करीब राखड़ डंपिंग का सिलसिला जारी है।
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स्थानीय ग्रामीणों के आरोंप
गांव वालों का आरोप है कि इस पूरे मामले में पावर प्लांट प्रबंधन, स्थानीय सरपंच पति और राखड़ ट्रांसपोर्टर शिवम पैकेजिंग की मिलीभगत है। हाइवा वाहनों के माध्यम से लगातार राखड़ लाकर शासकीय जमीन पर डंप की जा रही है। यह भी सवाल उठ रहा है कि बिना प्रशासनिक संरक्षण के इतने बड़े पैमाने पर यह काम कैसे संभव है।
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पर्यावरण और जल स्रोतों पर बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक राखड़ डंपिंग का सबसे बड़ा खतरा पर्यावरण और जल स्रोतों पर पड़ रहा है। पावर प्लांट की राखड़ में कई प्रकार के हानिकारक तत्व होते हैं, जो मिट्टी और पानी में मिलकर प्रदूषण फैलाते हैं। यदि यही राखड़ नदी या नाले के संपर्क में आती है तो यह सीधे जल स्रोतों को भी दूषित कर सकती है, जिसका असर पूरे इलाके की पेयजल व्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।
क्या काम कर रहा पर्यावरण विभाग..?
इसके बावजूद पर्यावरण विभाग की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। जिस विभाग की जिम्मेदारी पर्यावरण संरक्षण और नियमों के पालन की निगरानी करना है, वही विभाग इस पूरे मामले में मौन दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कमीशन दो राखड़ जहां चाहो वहां पाट लो कि तर्ज पर काम कर रहा पर्यावरण विभाग।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। खुलेआम नियमों की अनदेखी हो रही है, लेकिन न तो डंपिंग पर रोक लगाई गई और न ही जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की कोई खबर सामने आई। इससे यह संदेह भी गहरा रहा है कि कहीं न कहीं इस ‘राखड़ खेल’ को संरक्षण मिल रहा है।
यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले दिनों में बोरई नदी और आसपास का पूरा क्षेत्र पर्यावरणीय संकट की चपेट में आ सकता है।फिलहाल ग्रामीणों की निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं, देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस ‘सफेद जहर’ के खिलाफ सख्त कदम उठाते हैं या फिर सकराली की जमीन और जल स्रोत यूं ही राखड़ माफियाओं के हवाले कर दिए जाएंगे।
प्रशासन ने जांच के दिए निर्देश
इस मामले को लेकर प्रशासन का कहना है कि शिकायत मिलने पर जांच कराई जाएगी। अधिकारियों के अनुसार यदि नदी या नाले के किनारे राखड़ डंपिंग पाई जाती है तो संबंधित प्लांट प्रबंधन के खिलाफ पर्यावरण विभाग को कार्रवाई के निर्देश दिए जाएंगे।





