केलो डैम के लगभग 2 किलोमीटर तक फैला है काली का मिट्टी ढेर..... उद्योगपतियों के मनमानी पर केलो परियोजना, पर्यावरण विभाग और जिला प्रशासन मौन...... जीवनदायिनी केलो नदी के किनारे उद्योगों का सैकड़ों डंपर राखड़ और औद्योगिक अपशिष्ट का अंबार...

रायगढ़। रायगढ़ की जीवनदायिनी और आस्था का केंद्र केलो नदी आज उद्योगों की बेलगाम मनमानी का शिकार होती दिखाई दे रही है। जिस नदी को रायगढ़ वासी श्रद्धा से "केलो मैया" कहकर पुकारते हैं, उसी के किनारों पर खुलेआम सैकड़ों डंपर राखड़, काली मिट्टी और औद्योगिक अपशिष्ट डंप किए जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि यह सब प्रशासन, पर्यावरण विभाग और केलो परियोजना के अधिकारियों की आंखों के सामने हो रहा है, लेकिन कार्यवाही के नाम पर केवल चुप्पी दिखाई दे रही है।चिराईपानी और लारा क्षेत्र सहित केलो नदी के आसपास स्थापित सैकड़ों उद्योग प्रतिदिन भारी मात्रा में राखड़, फ्लाई ऐश और अन्य औद्योगिक अवशिष्ट उत्पन्न करते हैं। पर्यावरणीय नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ऐसे अपशिष्टों का वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से निर्धारित स्थलों पर निपटान किया जाए, ताकि पर्यावरण, वन्यजीव और आम जनता को कोई नुकसान न पहुंचे। लेकिन रायगढ़ में नियमों को ताख पर रखकर उद्योगों द्वारा नदी किनारे, जंगलों और सार्वजनिक क्षेत्रों में खुलेआम अपशिष्ट डंप किया जा रहा है। सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि केलो नदी के तट पर डंप की गई यह काली मिट्टी और राखड़ आगामी बारिश के दौरान बहकर सीधे नदी में समाहित हो जाएगी। इससे नदी का जल प्रदूषित होगा, जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ेगा और नदी की प्राकृतिक धारा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका तो आने वाले वर्षों में केलो नदी का बड़ा हिस्सा राखड़ और औद्योगिक अवशिष्टों से पट सकता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर जिला प्रशासन, पर्यावरण विभाग और केलो परियोजना के अधिकारी किसका इंतजार कर रहे हैं? क्या किसी बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी के बाद ही कार्यवाही होगी? क्या उद्योगपतियों के आर्थिक प्रभाव के आगे कानून और पर्यावरण संरक्षण के नियम बौने साबित हो चुके हैं? रायगढ़ की जनता पहले ही वायु प्रदूषण की भयावह समस्या झेल रही है। उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहा है। अब यदि केलो नदी भी प्रदूषण की भेंट चढ़ गई तो रायगढ़वासियों को वायु संकट के साथ-साथ जल संकट का भी सामना करना पड़ेगा। आने वाली पीढ़ियां शायद यह पूछेंगी कि जब केलो नदी को बचाया जा सकता था, तब जिम्मेदार लोग आखिर मौन क्यों थे? यह केवल एक नदी का मामला नहीं है, बल्कि रायगढ़ के पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और भविष्य का प्रश्न है। यदि प्रशासन और सरकार ने समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए, तो जनता यह मानने को मजबूर होगी कि पर्यावरण संरक्षण के सारे दावे केवल कागजों तक सीमित हैं और उद्योगपतियों के सामने शासन-प्रशासन पूरी तरह नतमस्तक हो चुका है। अब केलो बचाने जिला कलेक्टर के हस्तक्षेप की उम्मीद   केलो नदी के किनारों पर बड़े पैमाने पर औद्योगिक राखड़, काली मिट्टी और अन्य अपशिष्ट डंप किए जाने का मामला अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी विषय बन गया है। बारिश शुरू होने के साथ इन अपशिष्टों के बहकर सीधे केलो नदी में मिलने की आशंका बढ़ गई है, जिससे नदी और आसपास के पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति में रायगढ़ के जिला कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी से अपेक्षा की जा रही है कि वे इस पूरे मामले का तत्काल संज्ञान लें। जिला प्रशासन के मुखिया होने के नाते उनके निर्देश पर राजस्व, पर्यावरण, खनिज, केलो परियोजना तथा संबंधित विभागों की संयुक्त टीम मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति का आकलन कर सकती है। यदि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो जिम्मेदार उद्योगों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए। केलो के तट पर उद्योग से निकलने वाले अवशिष्ट और मिट्टी आदि गिराने वाले उद्योगपति कहीं और दूसरे शहर या राज्य के नहीं है बल्कि यह लाखा चिराईपानी के आसपास की रसूक वाले उद्योगपति हैं रायगढ़ के विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों को अपने जेब में रखने की बात करते हैं और अब केलो नदी को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं। उम्मीद की जा रही है कि जिला कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी इस गंभीर विषय पर संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित कार्यवाही करेंगे, ताकि रायगढ़ की जीवनदायिनी केलो नदी को प्रदूषण और पाटने से बचाया जा सके और पर्यावरण संरक्षण के नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित हो।

केलो नदी से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं" रामचंद्र शर्मा,

नव निर्माण संकल्प समिति के अध्यक्ष एवं समाजसेवी रामचंद्र शर्मा ने केलो नदी के किनारे औद्योगिक अपशिष्ट और राखड़ डंप किए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "केलो नदी केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि रायगढ़ की जीवनरेखा और करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। उद्योगों द्वारा नदी के किनारे राखड़ और अन्य अपशिष्ट डंप करना पर्यावरण के साथ गंभीर खिलवाड़ है।" उन्होंने कहा कि "जिला प्रशासन को तत्काल पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी उद्योगों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। और उद्योगों द्वारा जो अपशिष्ट केलो डैम के आसपास कई किलोमीटर में गिराया गया है उसे तत्काल हटाने का प्रबंध भी करना चाहिए। यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। केलो नदी को बचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है और इसके लिए जनभागीदारी के साथ प्रशासन की सख्त कार्यवाही भी जरूरी है।"

केलो की रक्षा कौन करेगा-: दीपक मंडल 

       

इस विषय को जिला कांग्रेस कमेटी ग्रामीण के प्रभारी महामंत्री दीपक मंडल ने सोशल मीडिया में वीडियो पोस्ट करते हुए वित्त मंत्री ओपी चौधरी, जिला कलेक्टर और पर्यावरण विभाग पर सवाल उठाया कि केलो की रक्षा कौन करेगा ? उन्होंने बताया कि रायगढ़ के उद्योगपतियों को जिला प्रशासन की खुली छूट है इसीलिए नियम कानून और व्यवस्थाओं का धज्जियां उड़ाते हुए राखड़ और औद्योगिक अवशिष्टों को सड़क के ऊपर केलो नदी के किनारे धड़ल्ले से डम्प किया जा रहा है और इन पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है।

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